
धर्म की ध्वजा को लेकर पूरे विश्व में लाखों-करोड़ों लोगों को भगवान की भक्ति और अपनी अमृतमयी वाणी से सेवा, संस्कृति और संस्कारों से जोड़कर लोगों का जीवन बदलने वाले श्री 1008 गंगाशरण जी महाराज के आधिकारिक वेबसाइट में आपका स्वागत है।
पूज्य श्री 1008 गंगाशरण जी महाराज, मैहर स्थित संकटमोचन हनुमान छोटा अखाड़ा के महंत हैं और एक प्रख्यात सामाजिक कार्यकर्ता और मानवता के सेवाकारी हैं।
जन्म: 19 अगस्त 1923
निधन: 17 दिसम्बर 2020, प्रातः 4:15 बजे
प्रारंभिक जीवन
महन्त श्री जानकी वल्लभ शरण जू महाराज का जन्म मध्य प्रदेश के सतना ज़िले के निकट एक गाँव में वत्स गोत्रीय पयासी ब्राह्मण परिवार में हुआ। वे पाँच भाइयों में तीसरे स्थान पर थे। बचपन से ही उनका मन धार्मिक क्रियाकलापों एवं साधना में अत्यंत रुचि रखता था। विशेष रूप से वे हनुमान जी के परम भक्त थे।मात्र 12 वर्ष की आयु में, उन्होंने बड़ा अखाड़ा, मैहर में जाकर संस्कृत शिक्षा ग्रहण करने का निश्चय किया, भले ही उनके पिता व बड़े भाई ने उन्हें बार-बार रोका। लेकिन उनका आध्यात्मिक आकर्षण इतना गहरा था कि वे स्वेच्छा से निकल पड़े।
सन्यास और सेवा-पथ
एक वर्ष के भीतर ही उन्होंने सन्यास धारण कर लिया और आध्यात्मिक शिक्षा प्राप्त करनी प्रारंभ की। उस समय बड़ा अखाड़ा के प्रमुख थे - अनंत श्री विभूषित श्री प्रमोद वन बिहारी शरण जू महाराज (षडशास्त्री जी)। महन्त श्री जानकी वल्लभ शरण जू महाराज, उनके विरक्त एवं कृपापात्र प्रथम शिष्य बने। उन्होंने लगातार 30 वर्षों तक अपने गुरु की सेवा की - न केवल पूजा-पाठ में, बल्कि भंडार, आश्रम व्यवस्था तथा अखाड़े के अन्य कार्यों में भी सक्रिय रूप से योगदान दिया। इसी दौरान वे छोटा अखाड़ा, जहाँ पहले से हनुमान जी की सेवा स्थापित थी, वहाँ भी नियमित सेवा करते रहे।
छोटा अखाड़ा की स्थापना और समाज सेवा
गुरुदेव के वैकुण्ठवासी होने के पश्चात वे स्थायी रूप से छोटा अखाड़ा, मैहर में ही रहने लगे। वहाँ उन्होंने न केवल धार्मिक साधना को आगे बढ़ाया, बल्कि गरीब, निरीह बच्चों, यात्रियों एवं साधु-संतों की सेवा को भी अपना जीवनधर्म बना लिया - चाहे वे किसी भी सम्प्रदाय के क्यों न हों।
व्यक्तित्व की विशेषताएँ
महन्त जी का जीवन अत्यंत सादा, सहज, सेवा-प्रधान और पूर्णतया साधुता से परिपूर्ण था। वे अपने सारे कार्य स्वयं करते थे और कभी किसी से सहयोग नहीं लेते थे। 98 वर्ष की आयु में भी वे इतने स्वस्थ थे कि बिना चश्मे के पढ़ सकते थे, और मुख का कोई दांत हिला तक नहीं था।
महाप्रयाण
17 दिसम्बर 2020 को प्रातः 4:15 बजे उन्होंने देह त्याग किया। उनका अंतिम संस्कार प्रयागराज में किया गया, जो उनके सबसे छोटे विरक्त शिष्य महन्त श्री गंगाशरण जू महाराज द्वारा संपन्न हुआ।
उत्तराधिकारी और प्रेरणा स्रोत
महन्त श्री जानकी वल्लभ शरण जू महाराज के छात्र, अनुयायी व शिष्यगण, विशेषकर महापुरुष चरणानुरागी महन्त श्री गंगाशरण जू महाराज, उनके द्वारा स्थापित छोटा अखाड़ा ट्रस्ट, मैहर के माध्यम से उनके आदर्शों और शिक्षाओं को आगे बढ़ा रहे हैं।
उपसंहार
महन्त श्री जानकी वल्लभ शरण जू महाराज का जीवन एक आदर्श साधु जीवन की मिसाल है। उन्होंने त्याग, सेवा, भक्ति और परिश्रम के बल पर न केवल धार्मिक क्षेत्र में विशिष्ट योगदान दिया, बल्कि समाज के वंचित वर्ग के लिए भी सतत कार्य किया।
त्रेतायुग और राम वन गमन पथ से जुड़ाव
मैहर की इस पावन भूमि का इतिहास अत्यंत प्राचीन है। पुरानी मान्यताओं और 'राम वन गमन पथ' के प्रसंगों के अनुसार, अपने वनवास काल के दौरान मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम, माता सीता और भ्राता लक्ष्मण के साथ इस स्थान से गुज़रे थे और उन्होंने यहाँ दातुन (दंतधावन) किया था। इसी पवित्रता को दृष्टिगत रखते हुए, कालान्तर में मैहर के तत्कालीन महाराज ने यहाँ एक भव्य मंदिर का निर्माण करवाया था। प्रारंभ में यहाँ केवल एक ही अखाड़ा हुआ करता था, जिसमें दिव्य 'श्री राम दरबार' विराजमान है।
संकट मोचन हनुमान जी की स्थापना और रक्षक स्वरूप
यह शाश्वत सत्य है कि जहाँ प्रभु श्री राम होते हैं, वहाँ उनके परम भक्त हनुमान जी अवश्य विराजमान होते हैं। इसी भाव के साथ बाद में यहाँ श्री संकट मोचन हनुमान जी की स्थापना हुई। बुजुर्गों और स्थानीय मान्यताओं के अनुसार यह मंदिर अत्यधिक प्राचीन है। यहाँ विराजमान हनुमान जी, माता शारदा और प्रभु श्री राम के परम 'पहरेदार' (रक्षक) के रूप में इस पूरे क्षेत्र की रक्षा करते हैं।
छोटा अखाड़ा का निर्माण और गुरु परंपरा
समय के साथ, इस दिव्य स्थान पर साकेत धाम निवासी पूज्य गुरुवर अनंत श्री विभूषित प्रात: स्मरणीय तपोनिष्ठ महन्त श्री जानकी वल्लभ शरण जू महाराज ने आकर अपनी नि:स्वार्थ सेवा और तपस्या प्रारंभ की। उन्हीं की अखंड सेवा, निष्ठा और संकल्प के परिणामस्वरूप इस वर्तमान 'छोटा अखाड़ा' का निर्माण और विस्तार हुआ।
वर्तमान स्वरूप और दर्शन
वर्तमान में, उसी महान गुरु परंपरा को आगे बढ़ाते हुए पूज्य महंत श्री श्री 1008 श्री गंगा शरण जू महाराज इस आश्रम और मंदिर का संचालन कर रहे हैं। यह पावन मंदिर सभी दर्शनार्थियों और श्रद्धालुओं के लिए सदैव खुला रहता है, जहाँ आकर भक्तगण प्रभु की कृपा और आत्मिक शांति प्राप्त करते हैं।
पूज्य गुरुदेव के आशीर्वाद और श्री संकट मोचन हनुमान जी की कृपा से, हमारा आश्रम निरंतर अन्नक्षेत्र (भंडारा), वृद्ध जन सेवा, असहायों की सहायता और संस्कारों की शिक्षा के लिए समर्पित है। हमारा प्रयास है कि हम अपनी संस्कृति को सहेजते हुए एक करुणापूर्ण, सेवाभावी और धर्मपरायण समाज का निर्माण करें।
शास्त्रों में दान का अत्यंत महत्व बताया गया है। आपका एक छोटा सा सहयोग भी हमें गौ माता की रक्षा, वृद्ध जन आश्रम का संचालन, असहायों के लिए निरंतर अन्नक्षेत्र (भंडारा), और सनातन संस्कृति के संवर्धन जैसे पुनीत कार्यों को चलाने में संबल प्रदान करता है। इस ईश्वरीय कार्य में सहभागी बनकर पुण्य लाभ अर्जित करें।
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